हिमाल्य की गोद मे बसे हिमाचल मे शायद ही कोई ऐसा गॅाव या नगर होगा जहा देवी देवताओं का वास ना हो । इसी तरह के प्राचीन मान्दिर मै मुरादे पूरी करने वाली एक है, भलेई स्थित माँ भद्रकाली का मन्दिर । कहा जाता है की करीब साडे चार सो साल वर्ष पूर्व माँ भद्राकाली मात्रीलोक मै प्रकट हुई थी । भलेई माता की महिमा आज हिमाचल प्रदेश के अलावा अन्य पडो्सी राज्यो मै भी है। बनीखेतसे से 35 किलोमीटर दूर भलेई नामक ग्राम सुशोभित इस भव्य मन्दिर भीतर भाग मे माँ की लगभग दो फ़ुट ऊची मूरत है। श्रद्धालुओ का विश्वाश है,कि श्रद्धापुर्वक पूजा अर्चना करने से  माँ की प्रतिमा से पसीना निकलता है। जिसे श्रद्धालु माँ का अशीरवाद मानते है। कहा जाता है कि 1569 ई मे चम्बा रियासत के राजा प्रताप सिंघ को माँ जगदम्बा ने स्व्प्न मे बताया कि ये भद्र्काली है। ओर भ्राण नामक गाव मे बावड़ी के समीप एक पत्थर पर खड़ी है। पत्थर के नीचे धन के तीन चरवे है,आप यहाँ आ कर उसे लेकर जाओ । माँ ने बताया कि चरवे के धन का प्रयोग मन्दिर के निर्माण यग़्य प्रतिष्टा व राजकार्य मे किया जाए । कहा जाता है कि स्व्प्न मे यह भी चेतवनी दी गई कि मन्दिर मे महिलाओ का प्रवेश वर्जित रहेगा । सुबह आंख खुलते ही राजा ने एसा पाया। वह माँ की प्रतिमा को पालकी मे सजाकर खुब् शानोशोकत के साथ कारदारकोटी (भलेई) ले आये।  विश्राम के उप्रान्त जब वो उट्ने लगा तो पालकी वहां स्थिर हो गई । तभि आकाश्वाणी हुई कि हे राजन अब मे चम्बा नहीं जाऊँगी मेरा मन्दिर यही बनवा दो । राजा प्रताप ने वेसा ही एसा ही किया । पुर्वज ब्ताते है कि लग्भग चार दश्क पूरव मां ने एक उपासक दुर्गा देवी को स्व्पन मे दर्शन की अनुमति दे दी तब से “महिलाएं भी मा के दर्शन का सोभाग्य प्राप्त कर रही है ।कहा जाता है कि एक बार कुछ लोग भगवती को ना जाने किस कारन चुरा ले गये जो मां को चोह्ड़ा पुल तक ही ले पाये ओर वो अन्धे हो गए ।

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